शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

जुलाई 2026, अंक 73

 

शब्द-सृष्टि

जुलाई 2026, अंक 73


परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है !

संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार का जाना...... !?

काव्य

1. बरसात (कुण्डलियाँ छंद) 2. पश्चाताप (सार्द्ध मनोरम छंद) – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

अमलतास – डॉ. रक्षा मेहता

व्यक्ति विशेष : विशेष स्मरण 

स्वामी विवेकानंद : युग चेतना के जीवंत प्रकाश स्तंभ – डॉ. घनश्याम बादल

लोक साहित्य मनीषी डॉ. अरुणेश नीरन – इंद्र कुमार दीक्षित

भामाशाह – सुरेश चौधरी

आलेख  

कथाकारों की दुनिया में भीष्म साहनी का स्थान – डॉ. रक्षा मेहता

स्मृति शेष 

तीजनबाई के (न) होने का अर्थ! – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

जाना लोकगायन की स्वर-सम्राज्ञी का: एक थी तीजन बाई – डॉ. घनश्याम बादल

निबंध

मैं सुमन हूँ – शशिबिन्दुनारायण मिश्र

पुस्तक चर्चा 

घटती ज़िंदगी का अहसास (नाटक-संग्रह, महेश सांख्यधर) – डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

सम्पा (उपन्यास-मीनाक्षी चौधरी और संजीव पालीवाल) – आर्या झा

पीड़ा के द्वीप (हाइकु-संग्रह, सूर्य नारायण गुप्त ‘सूर्य’) – बलजीत सिंह

लोकगीत

1. कजरी 2. मेघ मल्हार – डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’

स्मृति शेष


तीजनबाई के (न) होने का अर्थ!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

लोक कला की शिखर विभूति तीजनबाई (24 अप्रैल, 1956 - 5 जुलाई, 2026) पंचतत्व में विलीन हो गईं! लाल मिट्टी वाले छत्तीसगढ़ के आसमान में गूँजती एक आदिम और ओजस्वी हुंकार अचानक शांत हो गई है!! उनके हाथों से तंबूरे का छूटना केवल एक कलाकार का जाना नहीं;  एक पूरे युग, एक सशक्त परंपरा और मिट्टी की उस सोंधी गंध का तिरोहित हो जाना है, जिसने दशकों तक भारत ही नहीं, समूची दुनिया को सम्मोहित किए रखा था!!!

तीजनबाई का जीवन कभी भी मखमली रास्तों का सफर नहीं रहा। एक साधारण पारधी परिवार में जन्मीं तीजन का बचपन जिन दुश्वारियों और संघर्षों की भट्टी में तपा, उसने ही उनके भीतर के फौलाद को गढ़ा था। जिस दौर में महिलाओं के लिए कापालिक शैली’ (खड़े होकर और सघन अभिनय के साथ गायन) में महाभारत की कथा बाँचना एक बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता था, उस दौर में उन्होंने तंबूरा उठाया। समाज के ताने सहे। बाल-विवाह का दंश झेला।  बिरादरी से बहिष्कृत तक होना पड़ा। पर तीजनबाई ने कभी अपनी आवाज़ को दबने नहीं दिया। उनका संघर्ष महज़ एक लोक कलाकार का संघर्ष नहीं था। वह एक स्त्री का उन पितृसत्तात्मक मान्यताओं के खिलाफ खुला विद्रोह था, जिसकी ढाल उनका तंबूरा बना; और सबसे मारक हथियार उनकी बेखौफ आवाज़ बनी।

तीजनबाई का स्वभाव उनके गायन की ही भाँति अकृत्रिम, खरा और ऊर्जा से लबालब था। माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी। होंठों पर पान की लाली।  हाथों में मोरपंख लगा तंबूरा। जब वे मंच पर उतरतीं, तो  केवल एक गायिका नहीं रह जाती थीं। कथा के प्रवाह में पल भर में उनका तंबूरा गदा बनकर दु:शासन की जंघा तोड़ते भीम का अहसास कराता, तो अगले ही पल वे क्रोध में जलती द्रौपदी बन जातीं।

तीजनबाई का फक्कड़पन और सादगी ऐसी थी कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति, पद्मश्री-पद्मभूषण से लेकर पद्मविभूषण तक के सर्वोच्च अलंकरण भी उनके भीतर की उस ठेठ छत्तीसगढ़ियामहिला को बदल नहीं पाए। वे जितनी सहजता से पेरिस और लंदन के सुसज्जित मंचों पर गाती थीं, उतनी ही आत्मीयता से भिलाई के किसी छोटे से आयोजन में धूल भरे फर्श पर बैठकर भी रम जाती थीं।

कला के प्रति तीजन का समर्पण किसी तपस्या से कम नहीं था। बिना किसी औपचारिक या किताबी शिक्षा के, केवल अपने नाना के मुख से सुनी महाभारत की कथाओं को उन्होंने अपनी आत्मा में ऐसे बसा लिया था कि वे वृत्तांत और संवाद उनकी साँसों में धड़कते थे। उन्होंने पांडवानी को छत्तीसगढ़ के गाँवों की चौपालों से निकालकर वैश्विक मंचों का सरताज बना दिया। यह उनका अपनी मिट्टी और अपनी कला के प्रति निश्छल समर्पण ही था, जिसने एक क्षेत्रीय लोक विधा को सार्वभौमिक पहचान दिला दी।

आज तीजनबाई के “न होने” का अर्थ है लोक मंच से उस आदिम ऊर्जा, उस अप्रतिम साहस और उस बेलौसपन का छिन जाना। लेकिन, उनके “होने” का अर्थ बहुत बड़ा है। उनका जीवन भावी पीढ़ियों को  यह ज्वलंत संदेश देता रहेगा कि यदि आप अपनी जड़ों, अपनी बोली, अपने देहातीपन और अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं, तो पूरी दुनिया आपके सामने नतमस्तक होगी! आज भूमंडलीकरण के दौर में जब युवा अपनी स्थानीय पहचान से कट रहे हैं, तीजनबाई उन्हें सिखाती हैं कि असली वैश्विक होना अपनी जड़ों को गहराई से सींचना है। कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति और समाज से संवाद का माध्यम है।

तीजनबाई आज भले ही देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब भी कहीं कोई लोक कलाकार अपने तंबूरे की तार छेड़ेगा और अरे मोर दाऊ रे...की हुंकार भरेगा, तीजनबाई वहीं, उसी स्वर में जीवित हो उठेंगी! चिर-विदा तीजन दीदी!! छत्तीसगढ़ की मिट्टी और यह देश आपकी  गगनभेदी आवाज़ और निश्छल मुस्कान का सदैव ऋणी रहेगा!!!

***

प्रो. ऋषभदेव शर्मा

परामर्शी (हिंदी)

दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र

मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी

हैदराबाद


व्यक्ति विशेष : विशेष स्मरण


स्वामी विवेकानंद : युग चेतना के जीवंत प्रकाश स्तंभ

डॉ. घनश्याम बादल

4 जुलाई भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब केवल एक संन्यासी का देहावसान नहीं हुआ, बल्कि एक ऐसे युगपुरुष ने अपने नश्वर शरीर का त्याग किया, जिसने भारत की आत्मा को नई चेतना, नया आत्मविश्वास और नई दिशा प्रदान की।

मात्र उनतालीस वर्ष की अल्पायु में संसार से विदा लेने वाले स्वामी विवेकानंद ने जितना कार्य किया, उतना अनेक लोग लंबा जीवन जीकर भी नहीं कर पाते। उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और उनके अधूरे स्वप्नों का आत्ममंथन करने का दिन भी है।

12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में जन्मे इस विलक्षण बालक में बचपन से ही अद्भुत जिज्ञासा, निर्भीकता और सत्य की खोज का भाव था। वे केवल धार्मिक नहीं, बल्कि दर्शन, विज्ञान, इतिहास, साहित्य और संगीत के गंभीर अध्येता भी थे। उनका प्रश्न था – “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर उन्हें केवल श्री रामकृष्ण परमहंस से मिला। यहीं से नरेंद्रनाथ का जीवन बदल गया और वे  स्वामी विवेकानंद बने।

विवेकानंद की सबसे बड़ी विशेषता थी  धर्म को कर्म से जोड़ना। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भूखे व्यक्ति के लिए रोटी ही सबसे बड़ा धर्म है। वे मंदिरों तक सीमित ईश्वर के बजाय मनुष्य की सेवा में ईश्वर का दर्शन करते थे।

उनका संदेश, “दरिद्र नारायण की सेवा ही सच्ची पूजा है” आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने संन्यास को पलायन नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम बनाया।

1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में उनका “अमेरिका की बहनों और भाइयों” से आरंभ हुआ संबोधन केवल भाषण नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्मा की उद्घोषणा थी। कुछ ही मिनटों में उन्होंने पश्चिमी जगत को भारतीय दर्शन की विशालता, सहिष्णुता और सार्वभौमिकता से परिचित करा दिया। उस दिन एक गुलाम भारत का संन्यासी विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा था और पूरी दुनिया उसकी वाणी सुन रही थी।। यह भारत के आत्मगौरव का पुनर्जागरण था।

विवेकानंद को केवल शिकागो तक सीमित कर देना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनके जीवन का सबसे बड़ा पक्ष भारत-भ्रमण है। उन्होंने राजमहलों से लेकर झोपड़ियों तक भारत को देखा। वे केवल हिमालय की गुफाओं में ध्यान नहीं करते रहे, बल्कि किसानों, मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और उपेक्षित वर्गों की पीड़ा को निकट से अनुभव किया। कन्याकुमारी की शिला पर बैठकर उन्होंने जिस भारत का स्वप्न देखा, वह केवल आध्यात्मिक भारत नहीं था, बल्कि शिक्षित, आत्मनिर्भर, समरस और शक्तिशाली भारत था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि वे आधुनिक विज्ञान के समर्थक थे। उनका मानना था कि विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने युवाओं से अंधविश्वास छोड़कर विवेक, तर्क और अनुभव के आधार पर सत्य स्वीकार करने का आग्रह किया। वे कहते थे कि यदि किसी बात को बुद्धि स्वीकार नहीं करती, तो उसे केवल परंपरा के नाम पर मत मानो। यह दृष्टिकोण उन्हें रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं से अलग करता है।

स्वामी विवेकानंद स्त्री-शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के भी प्रबल समर्थक थे। उनका स्पष्ट मत था कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी महिलाओं की स्थिति से मापी जा सकती है। वे भारतीय नारी में अपार शक्ति देखते थे और चाहते थे कि उसे शिक्षा, सम्मान और अवसर मिले। उन्होंने कहा था कि पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता; समाज भी स्त्री और पुरुष दोनों की समान भागीदारी के बिना आगे नहीं बढ़ सकता।

जातिगत भेदभाव के प्रति उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। उन्होंने जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का विरोध किया और मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार उसके चरित्र, कर्म और ज्ञान को माना।

वे सामाजिक समरसता के पक्षधर थे। उनके लिए राष्ट्र निर्माण का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना भी था।

विवेकानंद के व्यक्तित्व का एक कम चर्चित पक्ष उनका अद्भुत संगठन कौशल था। उन्होंने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर सेवा, शिक्षा, चिकित्सा और राहत कार्यों की ऐसी परंपरा विकसित की, जो आज भी देश-विदेश में निरंतर चल रही है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता का सर्वोच्च रूप मानव सेवा है।

युवाओं के प्रति उनका विश्वास असाधारण था। उनका प्रसिद्ध आह्वान “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको”आज भी करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे युवाओं में केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति देखना चाहते थे। उनका कहना था कि हमें ऐसे मनुष्य चाहिए जिनकी मांसपेशियाँ लोहे की हों, स्नायु इस्पात के हों और जिनके भीतर अटूट आत्मविश्वास हो। उनके अनुसार राष्ट्र का भविष्य पुस्तकीय ज्ञान से नहीं, बल्कि चरित्रवान नागरिकों से निर्मित होता है।

आज जब समाज धार्मिक कट्टरता, सामाजिक विभाजन, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव, बेरोज़गारी और नैतिक संकट जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब विवेकानंद का दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।

उन्होंने धर्म को जोड़ने का माध्यम बनाया, आत्मविश्वास का संदेश दिया, जबकि आज का युवा अक्सर हीनभावना और अवसाद से संघर्ष कर रहा है। उन्होंने सेवा को साधना माना, जबकि आज सफलता का अर्थ प्रायः केवल आर्थिक उपलब्धि तक सीमित होता जा रहा है। उन्होंने भारतीय संस्कृति पर गर्व करना सिखाया, परंतु साथ ही संकीर्णता से दूर रहकर विश्वबंधुत्व का मार्ग भी दिखाया।

स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी उनके विचारों को शिक्षा, राजनीति, समाज, प्रशासन और व्यक्तिगत जीवन में उतारने का प्रयास करें। भारत यदि आत्मविश्वासी, ज्ञानवान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त, सामाजिक रूप से समरस और नैतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनना चाहता है, तो विवेकानंद का मार्गदर्शन आज भी उतना ही उपयोगी है जितना एक शताब्दी पहले था।

वास्तव में, स्वामी विवेकानंद का शरीर 4 जुलाई 1902 को पंचतत्त्व में विलीन हुआ, पर उनका विचार आज भी जीवित है।

वे वर्तमान के पथप्रदर्शक और भविष्य के प्रेरणास्रोत हैं। जब तक भारत अपनी आत्मा की खोज करता रहेगा, जब तक युवा अपने भीतर की शक्ति को पहचानने का प्रयास करता रहेगा और जब तक मानवता सेवा, समरसता तथा सत्य के मार्ग पर चलने की आकांक्षा रखेगी, तब तक स्वामी विवेकानंद का प्रकाश कभी मंद नहीं नहीं होगा।



डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667

काव्य


कुण्डलियाँ छंद

1

बरसात

 डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

बूँदें झर-झर झर रहीं,

होती जब बरसात ।

घुमड़-घुमड़कर घन करें,

अंबर में उत्पात ।।

अंबर में उत्पात,

चमा-चम चपला चमके ।

क्रोधित होकर लाल,

व्योम शिवजी सा दमके ।।

दिनकर दिन में छुपा,

खड़ा है ऑंखें मूँदें ।

देख-देखकर हँसें,

उछलती नन्ही बूँदें ।।

सार्द्ध मनोरम छंद

पश्चाताप


हो  गया  मैला  कुचेला  वस्त्र मन का ।

धूल धुसरित हो गया प्रासाद तन का ।।

भाव करुणा का कभी मन में न आया ।

लोभ लालच था सदा मन में समाया ।।

 

शक्ति थी जब पास तेरे आ न पाया ।

गीत करुणा प्रेम के भी गा न पाया ।।

दम्भ  में  झूठे  सदा  चलता  रहा था ।

बस स्वयं को ही सदा छलता रहा था ।।

 

आज  संबंधी  सगे  जब छोड़ बैठे ।

मित्र भी मुख आज सारे मोड़ बैठे । ।

हे गजानन हे विनायक लो शरण में ।

शीश रख करता नमन तेरे चरण में ।।

***

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी ‘काव्यांश’

जबलपुर

काव्य



अमलतास

डॉ. रक्षा मेहता

 

एक अमलतास तू

एक अमलतास मैं

तुझमें और मुझमें

अंतर गहरा

तू रंग बिखेरता

मैं रंग ओढ़ती

तू सुंदरता फैलाता

मैं सुंदरता खोजती

तू आकर्षक

मैं आकर्षित

एक तत्व तुझमें और मुझमें

कोमलता का एक-सा

एक अमलतास तू

एक अमलतास मैं । 

 ***


डॉ. रक्षा मेहता

हिंदी विभागाध्यक्षा

आर्मी पब्लिक स्कूल

गोलकोंडा

व्यक्ति विशेष : विशेष स्मरण

 

लोक साहित्य मनीषी डॉ. अरुणेश नीरन

इंद्र कुमार दीक्षित

   डॉ. अरुणेश नीरनहिन्दी और भोजपुरी  साहित्य जगत के  वह देदीप्यमान नक्षत्र थे जिन्होंने पूर्वांचल और देवरिया जनपद की साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का प्रकाश देश के बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज तक फैलाया। आपके गुरु भारतीय  वाङ्मय के अप्रतिम भाष्यकार डॉ. विद्या निवास मिश्र और साहित्य गुरु डा. शिवप्रसाद सिंह ने  आपको वह संस्कार दिया जो कविता तथा साहित्य की विविध विधाओं में छिपे सर्वहिताय लोक कल्याण की भावना को आत्मसात करके अपने जाग्रत विवेक के नेत्रों से अनुपस्थित में  भी उपस्थित को मूर्त कर देते थे। सभी को समरस भाव से सम्मान देने के उनके सलिल स्वभाव से  साहित्य से किंचित मात्र भी जुड़ा, पढ़ने लिखने वाला कोई अदना से अदना व्यक्ति भी उनके निकट जाकर अपनापन महसूस कर सकता था। इस अर्थ में  उनका नीरनउपनाम पूरी तरह सार्थक हुआ। अपने सुदीर्घ साहित्यिक जीवन में डॉ. नीरन ने शिक्षा, समाज, लोक जीवन और  साहित्य जगत को अपने अनुकरणीय आचरण और उदात्त कृतित्व से सर्वदा  अनुप्राणित किया । साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, दस्तावेज वागर्थ, साहित्य अमृत जैसी सम्मानित पत्रिकाओं में आपकी कविताओं और सहित्यिक आलेखों को पढ़ने के लिये लोग लालायित रहा करते थे, अप्रैल1995 में  आपके नेतृत्व और मार्गदर्शन में देवरिया जैसे अख्यात स्थान में  विश्व भोजपुरी  सम्मेलन का सफल आयोजन कराकर रातो रात आपने गँवई कही जाने वाली एक लोकभाषा भोजपुरी को विश्व पटल पर स्थापित करा दिया जो आज भी देवरिया वासियों के लिये अविस्मरणीय और गौरव की बात है ।सेतुसंस्था के बैनर तले समकालीन भोजपुरी साहित्य नामक समृद्ध त्रैमासिक पत्रिका के 33 दुर्लभ अंकों का प्रकाशन और उनमें  लिखे सम्पादकीय आपके विराट साहित्यिक व्यक्तित्व के अन्यतम  दस्तावेज हैं। व्याख्यानों में  आपके वाग्मिता की अजस्र धारा  बड़े-बड़े प्रख्यात आलोचकों  और साहित्यिकों को भी चमत्कृत कर देती थी। यही नहीं  एक साहित्यिक यायावर के रूप में आपने देश विदेश की असंख्य यात्राएँ की, जिनका विवरण पढ़ने  की लालसा आपके  शुभचिंतकों को उत्सुक किये  रहती है। देश विदेश के तमाम साहित्यिक  आयोजन आपकी उपस्थिति के बिना फीके होते थे।  आपके कुशल सम्पादन में प्रकाशित पुरइन पात,‘भोजपुरी वैभव’(दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में पढाई जाने वाली पुस्तक),  ‘भोजपुरी  हिन्दी अंग्रेजी शब्दकोश’, ‘हमार गाँव’ (अपने गाँव  के बारे में भोजपुरी  हिन्दी के बीस समर्थ लेखकों का संस्मरण), ‘अक्षर पुरुष’ (पं विद्यानिवास मिश्र जी से सम्बंधित सन्समरण) तथा हाल ही में प्रकाशित देवरिया अतीत से वर्तमान तक(अनामिका प्रकाशन  प्रयाग राज से प्रकाशित जनपद देवरिया पर सन्दर्भ ग्रंथ) आजादी के अमृत महोत्सव काल में  स्वतन्त्रता संग्राम में जनपद देवरिया (उ. प्र.) महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी वि. वि. वर्षा से प्रकाशित ग्रेजी हिंदी भोजपुरी शब्दकोशऐसे संदर्भ ग्रंथ हैं जो हिन्दी भोजपुरी  साहित्य के अमूल्य निधि के रूप में रेखांकित किये जायेंगे।इसके अलावा विश्व भोजपुरी  सम्मेलन  द्वारा ‘भोजपुरी  के अमर लोकगीत’( भक्ति चक्र, जीवनचक्र, ऋतु चक्र और श्रम चक्र) नाम से मधुर लोकगीतों के चार कैसेटों  का सम्पादन भी आपकी अनुपम देन है।

         अन्तर्राष्ट्रीय संस्था विश्व भोजपुरी सम्मेलन’ के महासचिव के रूप में अपने अथक प्रयास से डॉ. नीरन ने  न केवल भोजपुरी लोक साहित्य से विश्व को परिचित कराया बल्कि अनेक देशों में इसका प्रचार प्रसार किया, इस महान कार्य के लिये  यदि आपको लोक भाषा भोजपुरी  का विश्व राजदूतकहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसके अलावा अपने गुरु प्रो.  विद्या निवास मिश्र की स्मारक संस्था विद्या श्री न्यासके न्यासी सदस्य  और साहित्य अकादमी, भारत से जुड़कर  सतत साहित्य सेवा में लगे रहे । महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय  हिन्दी विश्व विद्यालय वर्धा में अतिथि आचार्य के रूप में हिन्दी भाषा के संवर्धन के लिये अनेक ग्रंथों के सम्पादन का दायित्व सम्भाला,जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

         डॉ. नीरन का जन्म देवरिया खास के सुख्यात पंक्ति पावन  ब्राह्मण परिवार में  भारत की आजादी के पूर्व जनपद के रूप में देवरिया जिला के उद्भव के साथ साथ ही 20 जून 1946 को पं  जगदीश मणि  के पुत्र के रूप में हुआ। आरम्भिक शिक्षा दीक्षा देवरिया के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में ही हुई।आप बताते थे कि देवरिया स्थित नागरी प्रचारिणी सभा में बैठकर पुस्तकों से लगाव और अध्ययन का सुदृढ़ संस्कार मिला जो आगे के जीवन का पाथेय बना। अपने गाँव देवरिया खास के सम्बंध में डॉ. अरुणेश नीरन का संस्मणात्मक आलेख पठनीय और तत्कालीन परिस्थितियों की सम्यक झलक  दिखाता है।


डॉ. अरुणेश नीरन

        1972-73 से बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी भाषा के प्रोफेसर और बाद के कई वर्षों तक वहाँ के प्राचार्य रहे नीरन जी  आम तौर पर  संस्थाओं में पदाधिकारी के रूप में, प्रबंधन से जुड़ना अथवा किसी प्रकार के सम्मान ग्रहण करने से जान बूझकर विरत रहने  की प्रवृत्ति रखते थे। कहा जाय तो नीरन जी के पीछे सम्मान ही भागते रहे, फिर भी  प्रतिष्ठित सहृदय संस्थाओं से उन्हों ने बहुत संकोच पूर्वक कर्मयोगी सम्मान, विद्या सागर सम्मान, भोजपुरी गौरव सम्मान और बिहारी वैभव सम्मान (बिहार सरकार) ग्रहण किया। ऐसे लोक साहित्य मनीषी पर हम देवरियावासियों को गर्व है।

             देवरिया की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था नागरी प्रचारिणी  सभा के आजीवन सदस्य  के रूप में  विभिन्न साहित्यिक समारोहों में डॉ. नीरन का सुझाव व मार्गदर्शन सभा को सदैव  मिलता रहा ।

       अक्षर ब्रह्म के अनन्य साधक  डॉ . नीरन जी  अप्रैल 2025 में जब दिल्ली अपने सुपुत्र डॉ. पारितोष के यहाँ  गए हुए थे तभी उनकी तबीयत खराब हुई, वहाँ इलाज के बाद स्वस्थ  होकर देवरिया आए पर कुछ ही दिनों के अनंतर फिर अस्वस्थ हो गए, गोरखपुर सिटी हॉस्पिटल  में भर्ती रहे, थोड़े सुधार के बाद देवरिया आए। पिछले 20 जून को देवरिया में  परिजनों और उनके शुभ चिंतकों ने देवरिया खास स्थित आवास पर उनका जन्मदिन मनाया।  दुबारा तबियत बिगड़ने पर पुनः सिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया , विशेष सुधार नहीं हुआ और अंततः 19 जुलाई  2025 को वह मनहूस दिन आ पहुंचा जब उनकी आत्मा परिजनों को रोते बिलखते छोड़ महा प्रयाण पर निकल गई।  खबर सुनकर उनके आवास पर हजारों की संख्या में देवरिया वासियों, साहित्यप्रेमियों तथा शुभेच्छुओं ने नम आँखों से अपने प्रिय साहित्यकार को विदाई दिया।       

          आज डॉ. अरुणेश जी भौतिक शरीर से इस दुनिया में नहीं हैं,पर उनकी सुकृति की सुगंध  वर्षों-वर्षों तक लोगों को आप्लावित करती रहेगी।आज उनके न  रहने पर जन्मदिवस  20 जून पर  हम उन्हें  याद करते हुए विगलित   वाणी से आत्मीय प्रणाम  निवेदित करते हैं और उस महनीय  साहित्य मनीषी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ॐ शांति! शांति!! शांति!!!

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इंद्र कुमार दीक्षित

देवरिया


स्मृति शेष


जाना लोकगायन की स्वर-सम्राज्ञी का:

एक थी तीजन बाई

डॉ. घनश्याम बादल

भारतीय लोककला की विशाल परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने आप में व्यक्ति से  संस्था बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ की महान पंडवानी गायिका तीजन बाई ऐसी ही ज्वलंत मशाल थी जो अपने गायन क्षेत्र में एक मिसाल बन कर रहीं । उन्होंने केवल पंडवानी लोकगायन शैली  जीवित ही नहीं रखी, बल्कि उसे गाँव की चौपालों से निकालकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँचाया।

तीजन बाई की दमदार आवाज़, प्रभावशाली अभिनय, सशक्त मंच-संचालन और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली अद्भुत प्रस्तुति ने उन्हें भारतीय लोककला का पर्याय बना दिया। उनका निधन केवल एक कलाकार का अवसान नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति के एक स्वर्णिम अध्याय का विराम है।

तीजन बाई 24 अप्रैल, 1956 को तत्कालीन मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के दुर्ग जिले के गनियारी गाँव में एक साधारण परिवार में जन्मीं। बचपन से ही अपने नाना से महाभारत की कथाएँ और पंडवानी गायन सुनने का अवसर मिला। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बनी। आर्थिक अभाव, सामाजिक उपेक्षा और रूढ़ियों से भरे वातावरण में उन्होंने अपने भीतर के कलाकार को जीवित रखा। उस समय पंडवानी की कापालिक शैली में मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, किंतु तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए निर्भीकता से इसी शैली को अपनाया और इतिहास रच दिया।

तीजन बाई का विवाह बहुत कम आयु में हो गया, लेकिन कला के प्रति समर्पण के कारण वैवाहिक जीवन अधिक समय तक नहीं चल सका। सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक विरोध के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। मात्र तेरह वर्ष की आयु में सार्वजनिक मंच पर उनकी पहली प्रस्तुति हुई और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पंडवानी वस्तुतः महाभारत की कथाओं का गेय एवं नाटकीय प्रस्तुतीकरण है। तीजन बाई ने इसे केवल गायन तक सीमित नहीं रखा। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव और कभी दुर्योधन की तलवार। वे स्वर, अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से पूरा महाभारत मंच पर उतार देती थीं। उनकी आवाज़ में ऐसी ऊर्जा थी कि श्रोता स्वयं को कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उपस्थित अनुभव करने लगते थे। उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह लोकभाषा की सहजता और शास्त्रीय संवेदनशीलता का अद्भुत संगम थी। उन्होंने सिद्ध किया कि महान कला किसी भाषा, क्षेत्र या वर्ग की मोहताज नहीं होती।  जिन लोगों को छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान नहीं था, वे भी उनकी प्रस्तुति से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।

देश के अनेक सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने फ्रांस, इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, रूस तथा अनेक अन्य देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनकी कला ने विश्व को बताया कि भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं, बल्कि गाँवों की लोकपरंपराओं में भी बसती है।

तीजन बाई को अनेक असंख्य सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्मभूषण (2003) तथा देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण (2019) से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। यें सम्मान  एक कलाकार को नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध लोकपरंपरा को मिले।

तीजन बाई ने पंडवानी को विलुप्त होने से बचाया अनेक युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया और यह विश्वास जगाया कि लोककला केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक शक्ति भी है। विशेष रूप से उन्होंने महिलाओं को यह साहस दिया कि वे परंपरागत सीमाओं को तोड़कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें।

पिछले कुछ समय से उपचाराधीन लगभग 70 वर्ष की तीजन बाई 5 जुलाई, 2026 को रायपुर में एम्स में लंबी बीमारी के बाद दिवंगत हुई ।  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, साहित्यकारों, कलाकारों तथा सांस्कृतिक संस्थाओं की भावभीनी श्रद्धांजलि खुद अपने आप में बताती है कि तीजन बाई भारतीय लोक कला क्षेत्र की कितनी बड़ी शख्सियत थी इसमें दो राय नहीं कि भारतीय लोककला के लिए उनका निधन अपूरणीय क्षति है।

तीजन बाई का जीवन केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की प्रेरक गाथा है। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रतिभा यदि दृढ़ संकल्प के साथ जुड़ जाए तो सामाजिक बंधन भी उसके मार्ग में बाधा नहीं बन सकते। वे उस भारत की प्रतिनिधि थीं जहाँ मिट्टी की सुगंध, लोकभाषा की मिठास और संस्कृति की गहराई मिलकर विश्व को आकर्षित करती है।

आज जब वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के दौर में लोककलाएँ अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, तब तीजन बाई का जीवन और उनकी साधना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनकी कला हमें यह सिखाती है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुँचाना है।   

यदि भारत को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता सुरक्षित रखनी है तो तीजन बाई जैसी लोक विभूतियों की परंपरा को जीवित रखना होगा।

तीजन बाई का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, किंतु उनकी गूँजती हुई आवाज़, महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली उनकी शैली और लोकसंस्कृति के प्रति उनका समर्पण सदैव भारतीय जनमानस में जीवित रहेगा।

वें आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक महान गायिका नहीं, बल्कि लोककला की अमर साधिका, सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक और भारतीय अस्मिता की शाश्वत स्वर-सम्राज्ञी बनी रहेंगी।

पंडवानी गायन शैली आज तीजन बाई के अभाव को महसूस कर रही है और आने वाला समय लोक कला के क्षेत्र में यह कहने को विवश कर देगा कि एक थी तीजन बाई जिसने पंडवानी गायन शैली को साथ में आकाश पर पहुंचाया। उसे महान गायिका को विनम्र श्रद्धांजलि... !  

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डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड – 247667


जुलाई 2026, अंक 73

  शब्द-सृष्टि जुलाई 2026, अंक 7 3 परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है ! संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार...